फिर जा रुकेगी बुझते ख़राबों के देस में, सूनी सुलगती सोचती सुनसान सी सड़क













शब भर रवाँ रही गुल-ए-महताब की महक ।


पौ फूटते ही ख़ुश्क हुआ चश्मा-ए-फ़लक ।


मौज-ए-हवा से काँप गया रूह का चराग़ ।














सैल-ए-सदा में डूब गई याद की धनक ।


फिर जा रुकेगी बुझते ख़राबों के देस में ।


सूनी सुलगती सोचती सुनसान सी सड़क ।














रुख़ फेर कर जो अब्र-ए-शबाना में छुप गया ।


जी में फिरा करेगी उसी चाँद की चमक ‌।


फिर पिछले पहर आइना-ए-अश्क में ‘ज़फ़र’ ।














लर्ज़ां रही वो साँवली सूरत सवेर तक ।


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