मैं डूबता जज़ीरा था मौजों की मार पर, चारों तरफ़ हवा का समुंदर सियाह था













वीराँ थी रात चाँद का पत्थर सियाह था ।


या पर्दा-ए-निगाह सरासर सियाह था ।


टूटे हुए मकाँ की अदा देखता कोई ।














सरसब्ज़ थी मुंडेर कबूतर सियाह था ।


मैं डूबता जज़ीरा था मौजों की मार पर ।


चारों तरफ़ हवा का समुंदर सियाह था ।














नश्शा चढ़ा तो रौशनियाँ सी दिखाई दीं ।


हैरान हूँ कि मौत का साग़र सियाह था ।


वो ख़्वाब था कि वाहिमा बस इतना याद है ।


बाहर सफ़ेद ओ सुर्ख़ था अंदर सियाह था ।


चमका कहीं न रेत का ज़र्रा भी रात-भर ।














सहरा-ए-इंतिज़ार बराबर सियाह था ।।


इस तरहा बादलों की छतें छाई थीं ‘ज़फ़र’ ।


सहमी हुई ज़मीन थी मंज़र सियाह था ।


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