उसी से आए हैं आशोब आसमाँ वाले, जिसे ग़ुबार समझते थे कारवाँ वाले













उसी से आए हैं आशोब आसमाँ वाले ।


जिसे ग़ुबार समझते थे कारवाँ वाले ।


मैं अपनी धुन में यहाँ आँधियाँ उठाता हूँ ।














मगर कहाँ वो मज़े ख़ाक-ए-आशियाँ वाले ।


मुझे दिया न कभी मेरे दुश्मनों का पता ।














मुझे हवा से लड़ाते रहे जहाँ वाले ।


मिरे सराब-ए-तमन्ना पे रश्क था जिन को ।


बने हैं आज वही बहर-ए-बे-कराँ वाले ।


मैं नाला हूँ मुझे अपने लबों से दूर न रख ।














मुझी से ज़िंदा है तू मेरे जिस्म-ओ-जाँ वाले ।


ये मुश्त-ए-ख़ाक ‘ज़फ़र’ मेरा पैरहन ही तू है ।


मुझे ज़मीं से डराएँ न कहकशाँ वाले ।


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