हवा-ए-वादी-ए-दुश्वार से नहीं रुकता, मुसाफ़िर अब तिरे इंकार से नहीं रुकता













हवा-ए-वादी-ए-दुश्वार से नहीं रुकता ।


मुसाफ़िर अब तिरे इंकार से नहीं रुकता ।


सफ़ीना चल जो पड़ा है चढ़ाओ पर तो कभी ।


मुख़ालिफ़ आती हुई धार से नहीं रुकता ।


मिरा ख़याल है तदबीर कोई और ही कर ।














हुजूम अब तिरी तलवार से नहीं रुकता ।


ठहरना चाहे तो ठहरे गा आप ही वर्ना ।


हमारी कोशिश-ए-बिस्यार से नहीं रुकता ।


अब इस के साथ ही बह जाइए कि ये सैलाब ।


ख़स-ओ-ख़ुमार के अम्बार से नहीं रुकता ।








रवाँ जो है सफ़र-ए-मंज़िल-ए-सदा हर-चंद ।


ये क़ाफ़िला मिरे मेआर से नहीं रुकता ।।


ये ऐसे लोग हैं आदत पड़ी हुई है जिन्हें ।


ये माल सर्दी-ए-बाज़ार से नहीं रुकता ।


मुसाफ़िरत में जो हारे न हौसला राही ।














तो लुत्फ़-ए-साया-ए-अश्जार से नहीं रुकता ।


हमारा इश्क़ रवाँ है रुकावटों में ‘ज़फ़र’ ।


ये ख़्वाब है किसी दीवार से नहीं रुकता ।


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