हवा बदल गई उस बेवफ़ा के होने से, वगरना ख़ल्क़ तो ख़ुश थी ख़ुदा के होने से













हवा बदल गई उस बेवफ़ा के होने से ।


वगरना ख़ल्क़ तो ख़ुश थी ख़ुदा के होने से ।


ख़बर नहीं मुझे मतलूब और क्या है कि मैं ।


ज़्यादा ख़ुश नहीं अर्ज़ ओ समा के होने से ।


हमेशा बर-सर-ए-पैकार हूँ कहीं न कहीं ।














मुझे इलाक़ा नहीं बच-बचा के होने से ।


ये शोला दिल से अलग हो के भी निकल आया


कुछ आग फैल गई है हवा के होने से ।


ये शहर कुछ भी मज़ाफ़ात के बग़ैर नहीं ।


वजूद अस्ल में है मावरा के होने से ।














जुदाई छोड़ती रहती है वस्ल की ख़ुशबू ।


मैं ज़िंदा रहता हूँ अक्सर क़ज़ा के होने से ।


मैं पुर्ज़ा पुर्ज़ा पड़ा हूँ जहाँ-तहाँ हर सम्त ।


ख़फ़ा सभी हैं मिरे जा-ब-जा के होने से ।


ज़रूरतें ही मिरी हो नहीं रहीं पूरी ।














रुका है क़ाफ़िला इक बे-नवा के होने से ।


जो रह गई है ये एक आँच की कसर तो ‘ज़फ़र’ ।


वो ज़र-गरी थी किसी कीमिया के होने से ।

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