बादलों अब तो बरस जाओ सूखी जमीनों पर , किसी का घर गिरवी है और किसी का लगान बाकि है







झूठा अपनापन तो हर कोई जताता है,


वो अपना ही क्या जो पल पल सताता है,


यकीं न करना हर किसी पर क्यूंकि,


करीब कितना है कोई यह तो वक्त बताता है।


मुझे तैरने दे या फिर बहाना सिखा दे,


अपनी रजा में अब तू रहना सिखा दे,


मुझे शिकवा न हो कभी किसी से, हे ईश्वर,


मुझे सुख और दुःख के पर जीना सिखा दे।


पंछी ने जब जब किया पंखों पर विश्वास,


दूर दूर तक हो गया उसका ही आकाश।








जमीन जल चुकी है आसमान बाकि है ,


वो जो खेतों की मदों पर उदास बैठे हैं,


उन्ही की आँखों में अब तक ईमान बाकि है ,


बादलों अब तो बरस जाओ सूखी जमीनों पर ,


किसी का घर गिरवी है और किसी का लगान बाकि है।


तेरी आजमाइश कुछ ऐसी थी खुदा,


आदमी हुआ है आदमी से जुदा,


ज़माने को ज़माने की लगती होगी,


पर धरती को किसकी लगी है बाद दुआ,


उदासी से तूफान के बाद परिंदे ने कहा,


चलो फिर आशियाँ बनाते हैं जो हुआ सो हुआ।


अगर सफलता पानी है दोस्त,


तो कभी वक़्त और हालात पे रोना नहीं,


मंजिल दूर ही सही पर घबराना मत दोस्तों,


क्योंकि नदी कभी नहीं पूछती कि समुन्दर अभी कितना दूर है।








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